Tuesday, September 28, 2010

हास्य नाटिका - "असली नेता"

पात्र परिचय-
१. नेताजी- विधायक बनने का ख्वाहिशमंद एक चुनावी उम्मीदवार
२. रामभरोसे- नेताजी का परिचित एक व्यक्ति
*****
(मंच पर रामभरोसे एक सामान्य ग्रामीण वेशभूषा में खड़ा है. उसकी राजनीति में काफी दिलचस्पी है क्योंकि उसके परिचित नेताजी विधानसभा का चुनाव लड़ने की तयारी में लगे हुए है.)

रामभरोसे- "आजकल जिसे देखो वही चुनाव लड़ने की बात करता है. जैसे यही सबसे फायदे का धंधा बन गया हो. न जाने इस देश का क्या होगा? जहाँ सब केवल अपना ही फायदा देखते है. अब नेताजी को ही देख लो, पिछली बार भी चुनाव लड़े थे. जमानत जब्त हो गई थी. फिर भी सबक नहीं लिया. अब दुबारा चुनाव लड़ने की तयारी में हैं."

रामभरोसे की बात समाप्त होते ही मंच पर धोती-कुरता और गाँधी टोपी पहने नेताजी का आगमन होता है.
रामभरोसे- "राम-राम नेताजी."
नेताजी- "राम-राम भाई. राम-राम."
रामभरोसे- "आज सुबह-सबेरे कहाँ चल दिए धोती उठाई के, नेताजी?"
नेताजी- "अरे भाई रामभरोसे, हम चले हैं अपने क्षेत्र में जनसंपर्क बनाने."
रामभरोसे- (अनजान बनते हुए)-"जनसंपर्क? ई जनसंपर्क का होता है नेताजी?"
नेताजी- "अरे मुरख. तू रहेगा गंवार का गंवार ही. तू इतना भी नहीं जानता. जनसंपर्क का माने होता है पब्लिक रिलेशन. यानि लोगों से मिलना-जुलना. उनका हाल-चाल लेना और उनकी सुविधा का ख्याल रखना. तभी तो कोई हमें वोट देगा."
रामभरोसे- "अच्छा! (सर हिलाते हुए) तो ई होता है जनसंपर्क."
नेताजी- "हाँ.तुझे मालूम है न की चुनाव फिर से होने वाला है."
रामभरोसे- "वो तो ठीक है. लेकिन पिछली बार तो आपकी जमानत भी नहीं बच पाई थी."
नेताजी- "लेकिन इस बार मैं रिकार्ड मतों से जीतूँगा."
रामभरोसे- "वो कैसे?"
नेताजी-"मैं इस बार ऐसा जबरदस्त प्रचार अभियान चलाऊंगा की सब चरों खाने चित जा गिरेंगे. उठने का मौका भी नहीं दूंगा ससुरन को. इस बार जीत मेरी ही पार्टी की होगी."
रामभरोसे- "आप तो रोज पार्टी ही बदलते रहते हैं नेताजी. वैसे आप अभी हैं किस पार्टी में?"
नेताजी- "देखो, मैंने टिकट तो माँगा था हाथी वालों से, लेकिन मेरी असली क़द्र जानी गैंडा छाप वालों ने.इसलिए मैं उस पार्टी में शामिल हो गया."
रामभरोसे- "गैंडा छाप?"
नेताजी- "हाँ, गैंडा छाप!"
रामभरोसे- "ई कोई नई पार्टी है का नेताजी? पहले तो कभी इसका नाम नहीं सुना.?"
नेताजी-"कोई बात नहीं. अब सुन लिया न!"
रामभरोसे- "हाँ."
नेताजी- "अगर कोई पार्टी इस बार चुनाव जीतेगी, तो वो सिर्फ गैंडा छाप ही होगी. जानते हो क्यों?"
रामभरोसे- "क्यों?"
नेताजी- "वो इसलिए की गैंडा कभी भी हार मानना नहीं जानता. वो इसलिए हार नहीं मानता क्योंकि उसकी खाल काफी मोटी होती है."
रामभरोसे- "हो-हो-हो...!"
नेताजी- "अब हँसना बंद कर बुरबक. ज्यादा दाँत मत दिखा. मैंने कुछ गलत कह दिया क्या?"
रामभरोसे- "नहीं नेताजी. आप भला कुछ कैसे कह सकते है? गैंडे की खाल तो सचमुच इतनी मोटी होती है की उसमे भाला भी मारो तो नहीं घुसता."
नेताजी- " तभी तो मैं कहता हूँ की इस बार मेरी जीत पक्की है."
रामभरोसे- "अच्छा नेताजी, एक बात बताइये. जब आप जीत कर मंत्री बन जायेंगे, तो सबसे पहला काम क्या करेंगे?"
नेताजी- "लो, ई भी भला कोई पूछने की बात है?"
रामभरोसे-"क्यों? मैंने कुछ गलत बात पूछ दिया क्या नेताजी?"
नेताजी- "अरे बुरबक, ई त कॉमन सेंस की बात है. क्या तू इतना भी नहीं जानता कि मंत्री बनने के बाद सबसे पहले क्या किया जाता है?"
रामभरोसे- "क्या किया जाता है नेताजी?"
नेताजी- "पहले एक मतलब कि बात सुनो. आज हमारे देश कि जनता बहुत जागरूक हो गई है. वह बार-बार किसी एक को चुनाव नहीं जिताती. इसलिए मैं सिर्फ एक बार किसी तरह साम, दाम, दंड, भेद से यह चुनाव जीत कर मंत्री जाऊं, फिर उसके बाद देखना कि मैं क्या करता हूँ!"
रामभरोसे- "फिर क्या करेंगे नेताजी?"
नेताजी- "फिर मैं एक ही झटके में इतना बड़ा घोटाला करूंगा कि अगले-पिछले सारे घोटालों का रिकार्ड टूट जायेगा. चारा घोटाला, यूरिया घोटाला, अलकतरा घोटाला, बोफोर्स तोप घोटाला, बाढ़ रहत घोटाला... सब उसके आगे बौने हो जायेंगे. घोटालों के सन्दर्भ में मेरा नाम गिनीज बुक में दर्ज हो जायेगा. फिर उसके बाद मैं मंत्री बनूँ या नहीं, कोई परवाह नहीं. मेरी सात पुश्तों के बैठ कर खाने का जुगाड़ तो हो ही जायेगा."
रामभरोसे- "लेकिन नेताजी, अगर कहीं आप पकडे गए तो फिर तो जेल कि हवा खानी पड़ेगी."
नेताजी- "दूर बुरबक.ऐसा कहीं होता है! बड़े मंत्री को इधर जेल होता है और उधर बेल हो जाता है. अगर बेल न भी हो तो वहां घर जैसा ही आराम मिलता है. खाने में छप्पन भोग, ए.सी.कमरा, गद्दे, रंगीन टीवी, मोबाइल. और तो और जेल के सारे स्टाफ नौकर-चाकर बने रहते हैं. समझा कि नहीं? अच्छा तो अब मैं चलता हूँ."
इतना कहकर नेताजी चले जाते हैं. रामभरोसे उनके चले जाने के बाद अपने आप से कहता है-
रामभरोसे- "वाह नेताजी. अब तो आप में सचमुच एक असली नेता के लक्षण आ गए हैं. मुझे पक्का विश्वास हो गया है कि इस बार आप जरूर चुनाव जीत जायेंगे!"

(पर्दा गिरता है.)

-मनोज कुमार

Monday, September 27, 2010

हंस का फैसला


  • बाल कहानी - मनोज कुमार
नदी के किनारे एक गांव था. गांव के बीच एक छोटा सा बरगद का पेड़ था. उस पेड़ पर चिड़िया का एक जोड़ा घोंसला बना कर रहता था. उस जोड़े का जीवन बड़ा शांतिपूर्वक व्यतीत हो रहा था. तभी एक कौआ उस पेड़ पर आया और चिड़िया के उस जोड़े से कहने लगा-"यह पेड़ हमारा है. तुमलोग इसे छोड़कर चले जाओ."
उस जोड़े ने कहा-"कैसे यह पेड़ तुम्हारा है? हम तो कई वर्षों से यहाँ रह रहे हैं."
"लेकिन अब मेरा है." कौआ बोला.
दोनों के बीच तकरार बढ़ गई. अंत में यह तय हुआ की चलो, हंस राजा के पास चलते हैं. वही इस बात का फैसला करंगे. चिड़िया और कौआ दोनों हंस के पास चले.
उनकी बात सुनकर हंस सोच में पड़ गया. चिड़िया के जोड़े ने उससे कहा-"हम कई सालों से यहाँ रह रहे हैं. मगर यह हमें कभी नहीं दिखा. यह बेवजह हमें सताने के लिए यहाँ आ गया है."
"यह पेड़ हमारे बुजूर्गों का था." कौआ अक्खड़ स्वर में बोला- "मैं कुछ समय के लिए बाहर चला गया, इसका मतलब यह तो नहीं कि तुम उस पर कब्ज़ा कर लो. मैं अब आ गया हूँ. इसलिए तुम्हें वह पेड़ छोडनी पड़ेगी."
कौए की मक्कारी भरी बातों को सुनकर हंस सबकुछ समझ गया. वह सोचने लगा-"यह दुष्ट कौआ बेवजह इन निर्दोष जोड़ों को तंग कर रहा है. वह सीधे कोई बात नहीं मानेगा. इसलिए इसके साथ कूटनीति से काम लेनी चाहिए." यह सोचकर उसने कौए को उस पेड़ पर रहने की अनुमति दे दी. और उस जोड़े से कहा कि वह अगले दिन आकर उससे मिले.
हंस जिस तालाब में रहता था, उसमे उसका एक नाग मित्र भी रहता था. उसका एक अन्य मित्र एक गिध्द भी था. उसने इस मामले में उन दोनों कि मदद लेने की सोची.
उस रात जब कौआ बरगद की एक डाल पर ऊँघ रहा था तभी उसके कानों में यह आवाज पड़ी-"नागराज, मैं बहुत बीमार हूँ. मुझे बैद्यराज गरुड़ ने कहा है कि अगर मैं कौए का मांस खा लूं तो मेरी बीमारी ठीक हो सकती है."
इतना सुनना था कि कौआ चौकन्ना हो गया. उसने देखा, बरगद कि ऊपरी डाल पर एक गिध्द बैठा हुआ है. उसके ठीक सामने कि डाल पर एक काला नाग लिपटा हुआ था. उसने कहा-"गिध्दराज, आज रात ही एक कौआ इस बरगद पर रहने के लिए आया है. मैं उसे डंस लूँगा तो वह मर जायेगा. फिर तुम उसे खाकर अपनी बीमारी दूर कर सकते हो."
इतंना सुनना था कि बरगद कि डाल पर बैठे कौए के होश उड़ गए. उसने सोच-"ओह! यहाँ रहना खतरे से खाली नहीं है." और अगले ही पल अँधेरे में उसने अपने पंख फड़फड़ाए  और किसी अनजान दिशा कि और उड़ गया.
अगले दिन जब चिड़ियों का जोड़ा हंस से मिला तो उसने बताया कि किस प्रकार उसने अपने नाग और गिध्द मित्र की मदद से एक अनोखी योजना बनाकर कौए को हमेशा के लिए वहां से भगा दिया है. उस जोड़े ने हंस को धन्यवाद् दिया और फिर से बरगद पर आकर ख़ुशी-ख़ुशी रहने लगे.
प्रकाशित- पंजाब केसरी, आर्यावर्त, कान्ति, तरंग भारती, दै. शेरे हरियाणा, मीडिया एंटरटेनमेंट फीचर्स

Friday, September 24, 2010

Wednesday, September 22, 2010

बिहार की राजनीति और चुनाव की आहट

एक पुरानी कहावत है- "प्यार और जंग में सब जायज है." आज के दौर में यह कहना गलत न होगा की "राजनीति और सत्ता की जंग में सब जायज है."
बिहार में विधानसभा चुनावों की घोषणा हो चुकी है. राजनीतिक दल अपनी उठा-पटक में लगे हुए हैं. सभी अपना-अपना समीकरण दुरुस्त करने में जुटे हुए हैं. एक बार फिर से मतदाताओं का दरबार सज गया है. टिकट न मिलने पर नेता एक पार्टी से कूद कर दूसरी पार्टी में ऐसे छलाँगे लगा रहे हैं जैसे पहली पार्टी में छूत का रोग लगा हो. . इससे पता चल जाता है की वे कितनी निःस्वार्थ राजनीती कर रहे हैं.
कहा जाता है की लोकतंत्र में जैसी जनता वैसी सरकार! ऐसे मतलबी और स्वार्थ की राजनीती से प्रेरित नेताओं को सबक सिखाना जनता का ही काम है. ऐसा तभी संभव है जब अवाम भी जातिगत और क्षेत्रवाद की भावनाओं से ऊपर उठकर निःस्वार्थ भाव से सही-गलत का चिंतन करे और अपने मत का मूल्य समझें. मतलबपरस्त, दागदार, बाहुबली नेता अपने सिवा किसी का क्या भला करेंगे? ऐसे स्वार्थलोलुप लोगों से राज्य की जनता को बचकर ही रहना चाहिए. अन्यथा फिर भगवान ही मालिक है.

Wednesday, September 15, 2010

वोट

Tuesday, September 14, 2010

हिंदी दिवस की शुभकामनाएँ

सबसे पहले तो आप सबको हिंदी दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ! कम-से-कम अपने देश में एक दिन तो ऐसा है जहाँ अंग्रेजी के पक्षधर लोग भी हिंदी के समर्थन में एक पंक्ति में खड़े दिखते है. १४ सितम्बर को हिंदी दिवस मनाने की परंपरा का निर्वाह करते हुए छः दशक गुजर चुके है, मगर राष्ट्रभाषा होते हुए भी अपने ही देश में, अपने ही घर में, अपने ही लोगों क्र बीच उसे वह हक़ और सम्मान नहीं मिला-जिसकी वह हक़दार है. भला हो बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे हिन्दीभाषी कुछ राज्यों का - जहाँ भाषाई रूप में यह शीर्ष पर विराजमान है, अन्यथा कई राज्यों में तो यह हाशिये पर खड़ी दिखती है.
ऐसा नहीं है की देश में हिंदी में काम नहीं होता, होता है- मगर आम लोगों की बात छोड़ दें तो ऊँचे तबके और प्रशासनिक महकमे में इसकी उपस्थिति कम से कमतर होती जाती है. हिंदी दिवस के अवसर पर वहां बड़ी-बड़ी बातें तो की जाती है, मगर केवल औपचारिकता वश. सच पूछा जाये तो हिंदी के असली पैरोकार तो यहाँ की आम जनता है. साधारण तबके के वे लोग हैं जो किसी दिखावे में नहीं बल्कि सिर्फ अपने काम में विश्वास रखते हैं. हिंदी दिवस क्या है- कब मनाया जाता है? क्यों मनाया जाता है- उसे इससे कोई विशेष लेना-देना नहीं. लेकिन वह हिंदी का असली पुजारी है. भले ही इसे लेकर उस पर पिछड़ेपन का धब्बा लगे- वह हासिये पर खड़ा रह जाये, लेकिन वही हिंदी का पहरुआ बना रहेगा.
हालाँकि स्थिति अब बदल रही है, हिंदी का वर्चस्व बढ़ रहा है.लेकिन इसका श्रेय उन आम लोगो को जाता है, जिन्होंने इस भाषा को महत्व दिया. इसे अपनाया और काम किया. हाँ, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसे और विस्तार देने की जरुरत है, जिसमे सब की भागीदारी अपेक्षित है.