Wednesday, October 6, 2010

पदक की ललक में

  • कहानी- मनोज कुमार
रात्रि का अंतिम पहर अलविदा कहने को आतुर था. सुबह की लालिमा अभी फिजां में बिखरी  नहीं थी. सारा गाँव अभी निद्रा में डूबा हुआ था. ऐसे में गाँव से चार किलोमीटर दूर नदी तट पर एक परछाईं तेजी से भागी चली जा रही थी.
वह था गाँव का एक किशोर बालक रामा- जो प्रतिदिन सुबह-सवेरे नीम अँधेरे में उठकर दौड़ लगाने निकल पड़ता था. दरअसल उसे एक तेज धावक बनना था. उसकी बचपन से एक ही तमन्ना थी, कि उसे देश का ही नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा धावक बनना है. इसके लिए उसे जितनी मेहनत करनी पड़ेगी, वह करेगा. वह देश और दुनिया में अपना नाम रौशन करेगा. एशियाड, ओलम्पिक, राष्ट्रमंडल खेलों जैसी बड़ी स्पर्धाओं में देश का प्रतिनिधित्व करके पदक जीतेगा.
इसमें कोई शक नहीं था कि वह एक बेहतरीन धावक था. इसका प्रमाण था - उसका अब तक का शानदार रिकार्ड!
उसने विद्यालय स्तर से लेकर जिले और राज्य स्तर तक सैकड़ों  गोल्ड मेडल जीते थे. उसका जूनून था कि उसे हर हाल में फर्स्ट आना है. उसके नीचे उसे कुछ भी मंजूर नहीं था.
वह तेजी से दौड़ता जा रहा था- और उसके मानस पटल पर पिछली एक घटना कि यादें ताज़ा हो आई. पहली बार उसे राज्य की तरफ से एक राष्ट्रीय स्पर्धा में  भाग लेने का मौका मिला था. और दुर्भाग्य  की  बात थी कि  वह उसमे पहला स्थान पाने से चूक गया. दूसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा. यह उसे गवारा नहीं हो रहा था. अगली बार अपने एक मित्र की सलाह पर वह एक ऐसा काम कर बैठा, जिसने उसे चयन समिति के कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया. किसी ने उस पर प्रतिरोधक  दवा  के सेवन का आरोप लगाया था. जांच में यह आरोप सही पाया गया था. चयन समिति ने उसे एक साल के लिए प्रतिस्पर्धा में भाग लेने पर प्रतिबन्ध लगा दिया. वह प्रतियोगिता में भाग लिए बिना घर वापस लौट आया.
अब वह पिता के कटघरे में खड़ा था. उन्होंने एक ही बात कही- "पदक का क्या मोल? बेईमानी की जीत से तो ईमानदारी की हार भली!"
स्वर्ण पदक की ललक में वह क्या कर बैठा था? इसकी जरुरत क्या थी? उसे क्यों अपने ऊपर भरोसा नहीं रहा था? एक छोटी सी भूल के लिए उसे कितनी फजीहत झेलनी पड़ी थी.
इन एक सालों में उसने लगातार परिश्रम ही किया था. कठोर परिश्रम... !
जो होना था, वो हो चूका था. अब उसने निर्णय ले लिया था. 
"मुझे हर हाल में अपने-आप को सिद्ध करना है. अपने लिए...देश के लिए...उसकी प्रतिष्ठा के लिए, मेहनत ही मेरा मूलमंत्र होगा."
और मन में यह विचार आते ही उसके क़दमों में एक तेजी आ गयी. ऐसा लग रहा था जैसे मंजिल काफी करीब आ गयी हो. सहसा एक नए उत्साह से वह भर उठा. वातावरण में चिड़ियों का कलरव गुंजायमान  हो उठा था. एक तरफ वह पवन की गति से भागा जा रहा था, दूसरी तरफ एक नया सूर्योदय आशा की किरणें चारों और फैला रहा था.




Sunday, October 3, 2010

चंपारण के गाँधी- पं. प्रजापति मिश्र

११२ वीं जयंती पर विशेष
सर्वविदित है कि गाँधी जी ने अपना सत्याग्रह आन्दोलन चंपारण की धरती से शुरू किया था. उन्हें यहाँ बुलाने का श्रेय राजकुमार शुक्ल को जाता है जिन्होनें अपने दो अन्य साथियों शेख गुलाब एवं शीतल राय के साथ लखनऊ जाकर कांग्रेस के 31 वें अधिवेशन में उन्हें यहाँ आने का आमंत्रण दिया था. अप्रैल 1917 में गाँधी जी चंपारण आये और यहाँ नीलहे किसानों की दुर्दशा देखी. और यही चंपारण सत्याग्रह की बुनियाद बना.
यहाँ उनकी कार्य योजनाओं को जमीनी रूप देने में बहुत सारे स्थानीय नेताओं का हाथ है. जिनमे एक प्रमुख थे- पं. प्रजापति मिश्र.
 चंपारण के गाँधी- पं. प्रजापति मिश्र
इसे एक संयोग ही माना जायेगा की  2 अक्तूबर को जिस दिन देश के दो महान नेताओं महात्मा गाँधी एवं लालबहादुर शास्त्री का जन्म हुआ, ठीक इसी तारीख को  1898 में चनपटिया (आज के पश्चिम चंपारण का एक प्रखंड) के गांव रानीपुर में प्रजापति मिश्र का भी जन्म हुआ.
गाँधी जी जब चंपारण आये तब ये 19 वर्ष के युवा थे. गाँधी जी के विचारों से ये बेहद प्रभावित थे.
1920 में जब असहयोग आन्दोलन शुरू हुआ तो ये पटना के बी.एन.कालेज में पढाई कर रहे थे. इन्होनें अपनी बी.ए. अंतिम वर्ष की परीक्षा छोड़ दी और आन्दोलन में कूद पड़े. अपने स्तर से इन्होने कई ग्रामसभाएं गठित की. 1923  ई. में उन्हें बेतिया नगरपालिका का उपसभापति चुना गया. 1928 की एक घटना थी. गाँधी जी के अस्पृश्यता निवारण कार्यक्रम में भाग लेने तथा दलितों के साथ भोजन करने के कारण ससुराल में उनका बहिस्कार तक कर दिया गया. लेकिन उन्होंने इसकी जरा भी परवाह नहीं की. वे जिस रह पर चल पड़े थे, उसमे कोई भी विध्न-बाधा उन्हें अपने इरादों से डिगा नहीं सकती थी. विभिन्न आंदोलनों में संलिप्त होने के कारण कई बार उन्होंने लाठियां खाई और गिरफ्तार हुए.
गाँधी जी देश को आर्थिक आधार एवं स्वावलंबन प्रदान करने के लिए कई तरह के ग्रामोद्योग कार्यक्रम एवं शिक्षा के लिए बुनियादी विद्यालय स्थापित करना चाहते थे. प्रजापति मिश्र ने इस कार्य हेतु कुमारबाग के निकट 1936 में लगभग 100 बीघे जमीन में वृन्दावन आश्रम की स्थापना की. उनके प्रयासों से अनेक बुनियादी विद्यालय खोले गए. राजकीय बुनियादी विद्यालय वृन्दावन (कुमारबाग) को देश का प्रथम बुनियादी विद्यालय होने का गौरव प्राप्त है. इसकी स्थापना 7 अप्रैल 1939 को हुई थी. इन्ही के प्रयासों से वहां शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालय भी खुला.
गाँधी सेवा संघ का पांचवा अधिवेशन इन्हीं के प्रयासों से 2 से 9 मई तक वृन्दावन में आयोजित हुआ, जिसके मुख्य कर्ता-धर्ता वे स्वयं थे. इस अधिवेशन में गाँधी जी के अलावा काका कालेलकर, खान अब्दुल गफ्फार खां, राजेंद्र प्रसाद, विनोबा भावे, जे.बी.कृपलानी, सरदार पटेल, श्रीकृष्ण सिंह , जाकिर हुसैन, अनुग्रह नारायण सिंह इत्यादि भी पधारे थे.
9 अगस्त 1942 को भारत छोडो आन्दोलन के समय इन्हें पुनः गिरफ्तार कर लिया गया.  देश को आजादी मिलने के लगभग छः वर्षों के बाद 4 मई 1953 को इनका देहावसान हो गया. वस्तुतः देखा जाये तो चंपारण की धरती पर यहाँ के विकास के लिए उन्होंने जो कुछ भी योगदान किया, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता है. इसी कारण उन्हें आज "चंपारण का गाँधी" के उपनाम से भी पुकारा जाता है.  बेतिया के निकट इनके नाम पर प्रजापति नगर नाम का एक हाल्ट भी है. २ अक्तूबर को महात्मा गाँधी एवं लालबहादुर शास्त्री के साथ-साथ जिले  में प्रजापति मिश्र की भी जयंती मनाई जाती है.
  • मनोज कुमार

Saturday, October 2, 2010

गांधी- अहिंसा का सजग प्रहरी

२ अक्तूबर पर विशेष
सत्य और अहिंसा - सबसे बड़ा मानवमूल्य
दो दिन पूर्व ही छः दशक से चले आ रहे अयोध्या विवाद का चिर प्रतीक्षित फैसला अदालत द्वारा सुनाया गया. सारे देश में सुरक्षा के कड़े इंतजाम थे. फैसले को लेकर एक आशंका और भय का सा वातावरण बना हुआ था. चूँकि मामला धर्म से जुड़ा हुआ था, इसलिए बीती घटनाओं को देखकर हर स्तर पर सतर्कता बरतने की कोशिश की गई. बहरहाल इसे लेकर कहीं कोई हिंसक वारदात नहीं हुई और शांति व सौहार्द बना रहा.
कुछ रास्ते कठिन होते हैं. अहिंसा के रूप में गांधीजी ने भी एक कठिन राह चुना था- उनका विरोध भी हुआ. लेकिन वे मोहन दास से गांधी बने तो सिर्फ इस कारण की वे अपने सिद्धांतों पर अंत तक डटे रहे. आजादी की कठिन लड़ाई सत्याग्रह के बूते लड़कर उन्होंने सिद्ध किया की हिंसा से हम वह स्थाई जीत नहीं प्राप्त कर सकते, जो अहिंसा के बलबूते पर कर सकते है.
अहिंसा का सजग प्रहरी 
दरअसल देखा जाए तो गांधीजी का यह फार्मूला मानव जीवन और मानव मूल्यों को संपोषित करते हुए उसे एक ऊंचाई तक ले जाता है. आज इसकी बेहद जरुरत है. दंगे और फसाद आम समाज में कोई नहीं चाहता. कुछ स्वार्थ से प्रेरित लोग ही इसकी बीज बोने का काम करते हैं. वे लोगों को आपस में लड़ाते हैं, खून की होली खेलते है और अपनी स्वार्थ की रोटियां सेंकते हैं.

समाज में प्रेम, शांति और सद्भाव बनाए रखने के लिए अहिंसा ही एकमात्र मार्ग है. इसी में जनकल्याण निहित है.

कुछ वर्ष पूर्व एक फिल्म आई थी- लगे रहो मुन्नाभाई.  काफी लोकप्रिय हुई थी. इसने गांधीवाद के धूमिल पड़ते विचारधारा को गांधीगिरी के आधुनिक नारे में बदल दिया. जहाँ यह सन्देश मिलता है की गांधी के सिद्धांतों पर चलकर ही सही मायनो में अपने लक्ष्य की प्राप्ति की जा सकती है. गांधीगिरी के ऐसे प्रयासों को आगे बढ़ाने की जरुरत है.

Friday, October 1, 2010

अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस - 1 अक्तूबर 2010

जीवन की संध्या बेला में
आज सुबह अख़बार पढ़ते हुए एक संदेश पर जाकर नजर ठिठक गई. पता चला आज एक अक्तूबर है.और इस दिन दुनिया भर में अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस मनाया जा रहा है.
हम सब अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इतने व्यस्त हो चले हैं कि आस पास कि छोटी-छोटी घटनाओं को दरकिनार करते चलते है. बड़े- बुजूर्गों कि अहमियत किसी पुरानी गाड़ी कि भांति कमतर होती जा रही है. किसी के पास सोचने का भी वक्त नहीं है. ये दिवस हमें एहसास दिलाते हैं कि, जरा ठहरें. हमारे आस-पास जो कुछ अनमोल है, उसकी क़द्र करना सीखें- अन्यथा एक दिन हमारा भी वही हश्र होगा.
मुफ्त में बुजूर्गों को सम्मान कि औषधि देना भी हम पर भारी गुजरता है. देखने सुनने में आता है कि विदेशों में बच्चे जब बड़े हो जाते हैं तो माता-पिता को ओल्ड एज होम में भेज देते है. उनकी देखभाल करना पसंद नहीं करते. यह कैसी मानवीयता और कैसा धर्म?
भारत अपनी संस्कृति का रक्षक और परम्पराओं का पोषक देश माना जाता है.  यह श्रवण कुमार का देश है.  यहाँ बड़े-बुजूर्गों को परिवार में अहमियत दी जाती है. लेकिन यहाँ भी मान्यताएं दरक रही है. हम अपने मूल्यों को कहीं विस्मृत कर रहे हैं. जिसने कभी हमें पुष्पित-पल्लवित किया, ऊँगली पकड़कर चलना सिखाया- फिर उनके जीवन कि संध्या बेला में अपनी बारी आने पर बेरुखी दिखा कर कौन सा सुख हासिल कर सकते हैं?

Wednesday, September 29, 2010

रिश्ता

  • कहानी -  मनोज कुमार

मिसेज मेहरा आज कई दिनों के बाद अपनी पुरानी सहेली विमला के घर आई थी. पहले वे अक्सर यहाँ आया करती थी मगर इस बार कई दिनों के बाद आना हो रहा था.
दोनों ड्राइंगरूम में बैठी बातें कर रही थी तभी विमला की बड़ी बेटी पूनम वहां चाय की ट्रे लेकर आ गई. पूनम ने मिसेज मेहरा का हाथ जोड़कर अभिवादन किया तो वे खुश रहने का आशीर्वाद देकर विमला से बोली- "तुमने पूनम की शादी के बारे में क्या सोचा है?"
"सोचना क्या है?" विमला ने कहा-"अभी तो यह बी.ए. कर रही है. कहती है इसके बाद फैशन डिजायनिंग का कोर्स करूंगी. शादी के लिए इसके पापा ने दस लाख का फिक्स डिपाजिट करा ही रखा है तो हमें कोई चिंता नहीं है."
मिसेज मेहरा चाय का एक घूंट लेकर थोडा ठहरकर बोली- "विमला, बुरा न मानों तो इसी सम्बन्ध में मैं तुमसे एक बात कहना चाहती हूँ."
"तो कहो न. चुप क्यों हो?"
"तुम तो जानती हो क़ि पूनम को हमारे घर में सभी अच्छी तरह जानते हैं और पसंद भी करते हैं. मैं चाहती हूँ क़ि हमारी यह दोस्ती रिश्तेदारी में बदल जाये?"
"क्या मतलब?" विमला ने चौंक कर कहा.
"मैं अपने बेटे सुधाकर के लिए तुमसे पूनम का हाथ मांगती हूँ." मिसेज मेहरा बोली.
जबकि उनकी बात सुनकर विमला ने बदले स्वर में कहा- "बुरा मत मानना प्रभा, दरअसल पूनम के पापा तो उसका विवाह किसी ऊँचे रसूख वाले घराने में करना चाहते हैं. वे चाहते हैं क़ि उनकी बेटी जहाँ जाए वहां राज करे. वे किसी साधारण परिवार में उसका रिश्ता नहीं करना चाहेंगे. फिर हमारे और तुम्हारे स्टेटस में अंतर भी तो कितना है..."
मिसेज मेहरा को अपनी सहेली से ऐसे किसी जवाब क़ि अपेक्षा नहीं थी. वह एकाएक कुछ कह नहीं सकी जबकि विमला ने कहना जारी रखा था- "तुम्हारे पति एक सामान्य शिक्षक हैं और सुधाकर भी तो अभी कुछ करता नहीं... पता नहीं आगे चलकर वह कुछ करेगा भी या नहीं...?"
"सुधाकर सिविल सर्विस क़ि तयारी कर रहा है." मिसेज मेहरा से रहा नहीं गया तो वह बोल उठी- "और तुम तो जानती ही हो क़ि पूनम और वह दोनों एक दुसरे को पसंद भी करते हैं."
"आजकल के ज्यादातर लड़के सिविल सर्विस की तैयारी करते ही देखे जाते हैं." विमला थोडा हंसकर बोली- "मगर सफल कितने होते हैं? लाखों में चंद गिने हुए कुछ खुशकिस्मत लोग...! और रहा सवाल इन दोनों क़ि पसंद का, तो तुम यूं क्यों नहीं कहती क़ि तुम्हारी नजर उन दस लाख रुपयों पर है जो पूनम के साथ उसके दहेज़ में जायेंगे!"
मिसेज मेहरा को उम्मीद नहीं थी क़ि उसकी खास सहेली उससे इस तरह का बर्ताव भी कर सकती है. उसे विमला क़ि बातें सख्त नागवार गुजरी. स्वयं को अपमानित सी महसूस करती हुई वह वहां से चली गई.
जबकि दरवाजे के पीछे खड़ी होकर सारा वार्तालाप सुन रही पूनम को अपनी माँ का यह व्यवहार बहुत ही बुरा लगा. उसे अपनी माँ पर काफी क्रोध आ रहा था. आखिर क्यों उसने उनसे इस तरह क़ि बाते कही? यह सच था वह सुधाकर को पसंद करती थी, मगर इंकार करने के और भी तो तरीके होते हैं. इस तरह उनका अपमान करना क्या उचित था? शायद अब वे दुबारा यहाँ कभी न आयें.
फिर इस घटना को हुए काफी समय बीत गया.
इस बिच पूनम ग्रेजुएशन की पढाई पूरी कर फैशन डिजायनिंग के कोर्स में दाखिला ले चुकी थी. घर वाले उसके लिए ऊँचे घराने के किसी योग्य वर की तलाश में जुट चुके थे.
एक दिन अख़बार में खबर छपी क़ि उनके शहर से पहली बार किसी ने आई.ए.एस. क़ि परीक्षा उत्तीर्ण की थी. मालूम हुआ क़ि वह कोई और नहीं बल्कि सुधाकर ही था जो क़ि अपने अंतिम प्रयास में फाइनेली सिलेक्ट हो गया था. उसके घर पर बधाई देने वालों का ताँता लग गया था.
उसी शाम पूनम ने अपनी माँ को पापा से कहते सुना- "सुनते हो, मिसेज मेहरा का लड़का सुधाकर आई.ए.एस. हो गया है. वही जो एक दिन पूनम का हाथ मांगने हमारे घर आई थी. मैं आज ही यह रिश्ता लेकर उनके पास जा रही हूँ."
जब पूनम ने ऐसा सुना तो उसे यकीन नहीं हुआ क़ि उसकी माँ ऐसा कह रही है. जिसने खुद एक दिन इस रिश्ते को तोड़ दिया था. आज वह इस रिश्ते को फिर से जोड़ने का प्रयास कर रही थी सिर्फ इसलिए क़ि सुधाकर अब कोई सामान्य प्रतियोगी नहीं, बल्कि आई.ए.एस. बन चुका था.
पूनम आज पहली बार किसी बात को लेकर अपनी माँ के विरोध में खड़ी थी- "माँ, अब तुम वहां मत जाओ...."
"क्यों?" विमला ने हैरानी से पूछा.
पूनम थोड़ी देर तक चुप रही. फिर नपे तुले शब्दों में बोली- "माँ, जिस सम्बन्ध को तुम पहले ही तोड़ चुकी हो उसे दुबारा लेकर तुम्हारा वहां जाना ठीक नहीं."
"ओह." विमला ने हंसकर कहा-"बेटी, तुम दुनिया के रीती-रिवाजों को जानती नहीं. जिसे गरज पड़ती है, उसे थोडा झुकना ही पड़ता है. सब ऐसा ही करते हैं. यही दुनिया का चलन है."
पूनम माँ के बदले हुए रूप को देख रही थी. माँ के जवाब का उस पर कोई असर नहीं हुआ था. कदाचित वह जान रही थी क़ि वहां से क्या जवाब मिलेगा?
रात को जब माँ मिसेज मेहरा के यहाँ से लौटी तो उनका चेहरा बता रहा था क़ि उन्हें अपने मिशन में कामयाबी नहीं मिली है. खाने के समय वे पापा से कह रही थी - "लड़का आई.ए.एस. बन गया है तो मिस्टर और मिसेज मेहरा के तो पाँव ही जमीं पर नहीं हैं. जब मैंने उन्हें पुराने रिश्ते का ध्यान दिलाया तो वे कहने लगी क़ि उनके पास बड़े-बड़े रिश्तों के आफर आ रहे हैं. लोग पच्चीस लाख नगद और एक कार देने क़ि बात कर रहे हैं."
वे काफी देर तक इस मामले को लेकर नुक्ताचीनी करते रहे और अन्दर दरवाजे से टेक लगाये पूनम नम आँखों से उन्हें सुन रही थी.

प्रकाशित - शुभ तारिका





Tuesday, September 28, 2010

ये सपना है

बी.बी.सी. लंदन से नई सहस्त्राब्दी के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम -
"ये सपना है" में 29 जनवरी 2000 को प्रसारित

"नई सहस्त्राब्दी में मेरा सपना है- एक सुन्दर, स्वस्थ और आतंक रहित समाज के निर्माण की. आज समाज में चारो ओर भय और आतंक का राज कायम है. इससे क्षेत्रीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवीय भावनाएं आहत हुई है. आखिर मानव ही आज अपनी मानवता को भूल गया है और पशुओं की मानिंद निर्विकार और भावशून्य हो गया है. भय और आतंक के इस राज से किसे क्या मिलने वाला है?
आज मनुष्यों में संवेदनहीनता बड़ी हद तक बढ़ गयी है. संवेदनशीलता से दूर-दूर तक उनका कोई नाता नहीं है. मानव में संवेदना का होना काफी जरूरी है. इस संवेदनशीलता के अभाव में मनुष्य अपने रिश्तों, संबंधों व नैतिक विचारों को कभी मजबूत नहीं कर सकता है, उसमे दरारें जरूर डाल सकता है.
मानवीयता की कमी और घोर संवेदनहीनता के कारण मनुष्य का रूप विकृत हो चला है. एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से डर कर रहना पड़ता है. क्या जीवन इसी का नाम है? डर-डर कर और सहम कर जीना ही क्या वर्तमान में जीवन की गति है? ऐसा न हो, इसलिए हमें अपने विचारों में कोमलता, संवेदनशीलता और मानवीयता के प्रति सम्मान रखना होगा. तभी इस धरती पर एक मनुष्य दुसरे किसी अनजान जगह पर नए लोगों के बीच उल्लास और भयमुक्त होकर रह सकेगा ! "
- मनोज कुमार

हास्य नाटिका - "असली नेता"

पात्र परिचय-
१. नेताजी- विधायक बनने का ख्वाहिशमंद एक चुनावी उम्मीदवार
२. रामभरोसे- नेताजी का परिचित एक व्यक्ति
*****
(मंच पर रामभरोसे एक सामान्य ग्रामीण वेशभूषा में खड़ा है. उसकी राजनीति में काफी दिलचस्पी है क्योंकि उसके परिचित नेताजी विधानसभा का चुनाव लड़ने की तयारी में लगे हुए है.)

रामभरोसे- "आजकल जिसे देखो वही चुनाव लड़ने की बात करता है. जैसे यही सबसे फायदे का धंधा बन गया हो. न जाने इस देश का क्या होगा? जहाँ सब केवल अपना ही फायदा देखते है. अब नेताजी को ही देख लो, पिछली बार भी चुनाव लड़े थे. जमानत जब्त हो गई थी. फिर भी सबक नहीं लिया. अब दुबारा चुनाव लड़ने की तयारी में हैं."

रामभरोसे की बात समाप्त होते ही मंच पर धोती-कुरता और गाँधी टोपी पहने नेताजी का आगमन होता है.
रामभरोसे- "राम-राम नेताजी."
नेताजी- "राम-राम भाई. राम-राम."
रामभरोसे- "आज सुबह-सबेरे कहाँ चल दिए धोती उठाई के, नेताजी?"
नेताजी- "अरे भाई रामभरोसे, हम चले हैं अपने क्षेत्र में जनसंपर्क बनाने."
रामभरोसे- (अनजान बनते हुए)-"जनसंपर्क? ई जनसंपर्क का होता है नेताजी?"
नेताजी- "अरे मुरख. तू रहेगा गंवार का गंवार ही. तू इतना भी नहीं जानता. जनसंपर्क का माने होता है पब्लिक रिलेशन. यानि लोगों से मिलना-जुलना. उनका हाल-चाल लेना और उनकी सुविधा का ख्याल रखना. तभी तो कोई हमें वोट देगा."
रामभरोसे- "अच्छा! (सर हिलाते हुए) तो ई होता है जनसंपर्क."
नेताजी- "हाँ.तुझे मालूम है न की चुनाव फिर से होने वाला है."
रामभरोसे- "वो तो ठीक है. लेकिन पिछली बार तो आपकी जमानत भी नहीं बच पाई थी."
नेताजी- "लेकिन इस बार मैं रिकार्ड मतों से जीतूँगा."
रामभरोसे- "वो कैसे?"
नेताजी-"मैं इस बार ऐसा जबरदस्त प्रचार अभियान चलाऊंगा की सब चरों खाने चित जा गिरेंगे. उठने का मौका भी नहीं दूंगा ससुरन को. इस बार जीत मेरी ही पार्टी की होगी."
रामभरोसे- "आप तो रोज पार्टी ही बदलते रहते हैं नेताजी. वैसे आप अभी हैं किस पार्टी में?"
नेताजी- "देखो, मैंने टिकट तो माँगा था हाथी वालों से, लेकिन मेरी असली क़द्र जानी गैंडा छाप वालों ने.इसलिए मैं उस पार्टी में शामिल हो गया."
रामभरोसे- "गैंडा छाप?"
नेताजी- "हाँ, गैंडा छाप!"
रामभरोसे- "ई कोई नई पार्टी है का नेताजी? पहले तो कभी इसका नाम नहीं सुना.?"
नेताजी-"कोई बात नहीं. अब सुन लिया न!"
रामभरोसे- "हाँ."
नेताजी- "अगर कोई पार्टी इस बार चुनाव जीतेगी, तो वो सिर्फ गैंडा छाप ही होगी. जानते हो क्यों?"
रामभरोसे- "क्यों?"
नेताजी- "वो इसलिए की गैंडा कभी भी हार मानना नहीं जानता. वो इसलिए हार नहीं मानता क्योंकि उसकी खाल काफी मोटी होती है."
रामभरोसे- "हो-हो-हो...!"
नेताजी- "अब हँसना बंद कर बुरबक. ज्यादा दाँत मत दिखा. मैंने कुछ गलत कह दिया क्या?"
रामभरोसे- "नहीं नेताजी. आप भला कुछ कैसे कह सकते है? गैंडे की खाल तो सचमुच इतनी मोटी होती है की उसमे भाला भी मारो तो नहीं घुसता."
नेताजी- " तभी तो मैं कहता हूँ की इस बार मेरी जीत पक्की है."
रामभरोसे- "अच्छा नेताजी, एक बात बताइये. जब आप जीत कर मंत्री बन जायेंगे, तो सबसे पहला काम क्या करेंगे?"
नेताजी- "लो, ई भी भला कोई पूछने की बात है?"
रामभरोसे-"क्यों? मैंने कुछ गलत बात पूछ दिया क्या नेताजी?"
नेताजी- "अरे बुरबक, ई त कॉमन सेंस की बात है. क्या तू इतना भी नहीं जानता कि मंत्री बनने के बाद सबसे पहले क्या किया जाता है?"
रामभरोसे- "क्या किया जाता है नेताजी?"
नेताजी- "पहले एक मतलब कि बात सुनो. आज हमारे देश कि जनता बहुत जागरूक हो गई है. वह बार-बार किसी एक को चुनाव नहीं जिताती. इसलिए मैं सिर्फ एक बार किसी तरह साम, दाम, दंड, भेद से यह चुनाव जीत कर मंत्री जाऊं, फिर उसके बाद देखना कि मैं क्या करता हूँ!"
रामभरोसे- "फिर क्या करेंगे नेताजी?"
नेताजी- "फिर मैं एक ही झटके में इतना बड़ा घोटाला करूंगा कि अगले-पिछले सारे घोटालों का रिकार्ड टूट जायेगा. चारा घोटाला, यूरिया घोटाला, अलकतरा घोटाला, बोफोर्स तोप घोटाला, बाढ़ रहत घोटाला... सब उसके आगे बौने हो जायेंगे. घोटालों के सन्दर्भ में मेरा नाम गिनीज बुक में दर्ज हो जायेगा. फिर उसके बाद मैं मंत्री बनूँ या नहीं, कोई परवाह नहीं. मेरी सात पुश्तों के बैठ कर खाने का जुगाड़ तो हो ही जायेगा."
रामभरोसे- "लेकिन नेताजी, अगर कहीं आप पकडे गए तो फिर तो जेल कि हवा खानी पड़ेगी."
नेताजी- "दूर बुरबक.ऐसा कहीं होता है! बड़े मंत्री को इधर जेल होता है और उधर बेल हो जाता है. अगर बेल न भी हो तो वहां घर जैसा ही आराम मिलता है. खाने में छप्पन भोग, ए.सी.कमरा, गद्दे, रंगीन टीवी, मोबाइल. और तो और जेल के सारे स्टाफ नौकर-चाकर बने रहते हैं. समझा कि नहीं? अच्छा तो अब मैं चलता हूँ."
इतना कहकर नेताजी चले जाते हैं. रामभरोसे उनके चले जाने के बाद अपने आप से कहता है-
रामभरोसे- "वाह नेताजी. अब तो आप में सचमुच एक असली नेता के लक्षण आ गए हैं. मुझे पक्का विश्वास हो गया है कि इस बार आप जरूर चुनाव जीत जायेंगे!"

(पर्दा गिरता है.)

-मनोज कुमार