Saturday, January 1, 2011

नववर्ष की शुभकामनायें


फिर से एक नया साल हम सबके जीवन में आ चुका है. हम इसका तहेदिल से स्वागत करें और कुछ नया और बेहतर करने का प्रयास करें जिससे अपने जीवन के साथ-साथ औरों के जीवन में भी खुशिया आयें. 
पहली जनवरी हम सब के लिए खास मायने रखता है. खास इसलिए भी कि हम इस दिन को अच्छे से सेलिब्रेट करना चाहते है. अपने रिश्तेदारों, मित्रों और शुभचिंतकों के साथ बधाई संदेशों का आदान-प्रदान करते हैं. यह सब खासा दिलचस्प होता है. 
बचपन के दिनों को याद करता हूँ तो वे स्कूल के दिन याद आते हैं जब नए साल के उपलक्ष्य में हम कुछ दोस्त मिलकर पिकनिक का प्रोग्राम बनाते थे. वह काफी मजेदार होता था. मेरा ज्यादातर समय ग्रीटिंग्स कार्ड बनाने में ही बितता था. मैं विशेषकर कार्टून चित्र वाले ग्रीटिंग्स बनता था, जिसकी फरमाईश मेरे दोस्त लोग अक्सर एडवांस में ही कर दिया करते थे. मुझे यह सब करना बहुत भाता था. 
एक बार कि बात थी. मेरे एक दोस्त को किसी ने नए साल कि बधाई दी. दोस्त जरा मजाकिया स्वभाव का था. उसने अपने ओढ़े हुए शाल  की और इशारा करते हुए मजाक में कहा कि मेरा ये शाल नया नहीं  बल्कि दो साल पुराना है. इस पर सबको काफी हंसी आई. 
बाद में मैंने इसी बात को लेकर नए साल का कार्टून-ग्रीटिंग्स बनाकर दोस्तों को भेजा. यह उस समय पटना से छपने वाले दैनिक आर्यावर्त में भी प्रकाशित हुआ था. उसे यहाँ अटैच कर रहा हूँ.
 आप सब को भी नववर्ष कि हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाइयां!  

Wednesday, December 22, 2010

परिवार


एक गाड़ी है
इसमें कई कल-पूर्जे होते हैं
ये सभी एक साथ काम करते हैं
तो गाड़ी आगे बढ़ती है
बढ़ती है, बढ़ती जाती है।
जब तक इसके हर अंग
काम करते हैं साथ-साथ
गाड़ी चलती जाती है
अनवरत बढ़ती है
अपनी मंजिल की ओर!
अगर कोई कल-पूर्जा,
काम करना बन्द कर दे
तो वही गाड़ी
चल सकती है कभी?
अपनी रफ्तार से चल पाना
उसके लिए तब
मुश्किल   हो जाता है।
बिना मंजिल तक पहुंचे ही
बीच रास्ते में ही वह
रूक सकती है।
   ं ं ं ं ं
इसी तरह
परिवार एक गाड़ी है
विभिन्न सदस्य इसके
अलग-अलग कल-पूर्जे हैं
सभी के अपने हिस्से का
अपना-अपना काम है।
अगर कोई हिस्सा
अपना काम न करे
तो क्या परिवाररूपी गाड़ी
आगे बढ़ सकती है कभी?
वह भी गाड़ी की ही भांति
बीच रास्ते में ही
रूक सकती है।
आगे बढ़ना उसके लिए
मुश्किल  हो जाता है।
इस परिवाररूपी गाड़ी को
आगे बढ़ाने के लिए
जरूरी है कि
इसके सभी कल-पूर्जे
अपने हिस्से का काम
करते रहें अनवरत!
यहां एक बात
विचारणीय है कि
अगर मशीनरूपी गाड़ी का
कोई  भाग काम नहीं करता
तो उसे बदला जा सकता है
लेकिन परिवार में
ऐसा फेर बदल
सम्भव नहीं होता।
ऐसी विकृति यहां
एक दरार पैदा करती है!
खराब कल-पूर्जे
बदले नहीं जाते यहां
बल्कि उन्हें किया जाता है अलग
और पैदा हो जाता है
हंसते-खेलते परिवार में
एक बिखराव.....!

Sunday, December 19, 2010

कलाकार की साधना


बाल कहानी- मनोज कुमार

गांव की पाठशाला में मुकेश पांचवी कक्षा में पढ़ता था। वह पढ़ने-लिखने में काफी होनहार था। उसकी प्रतिभा को निखारने और एक नया आयाम देने में पाठशाला के अध्यापक रामजी दास का बहुत बड़ा योगदान था। वह जानते थे कि मुकेश एक गरीब घर का किन्तु प्रतिभावान छात्र है। अगर उसकी प्रतिभा को सही मार्ग दे दिया जाए तो वह जीवन में बहुत आगे तक जा सकता है। इसलिए वे उसे हमेशा प्रोत्साहित किया करते थे। उनके प्रोत्साहन का ही परिणाम था कि मुकेश की पढ़ाई-लिखाई में न केवल रूचि बढ़ गई थी, बल्कि परीक्षाओं में उसके अब बेहतर परिणाम दिखने लगे थे। उनके स्नेह और प्रोत्साहन को देखकर मुकेश उन्हें अपना आदर्श  मानने लगा था। 
रामजी दास जब भी मुकेश के पिता से मिलते तो उसके बारे में चर्चा करते। उससे कहते कि अपने बेटे को खूब पढ़ाओ, वह जीवन में काफी तरक्की करेगा। तब उसके पिता कहते कि इस कमरतोड़ मंहगाई के जमाने में मैं भला उसे कहां तक पढ़ा पाऊंगा? यहां तो दो जून की रोटी ही बड़ी मुश्किल  से जुटा पाता हूं।
ये बातें सुनकर मास्टर साहब को बहुत दु:ख होता था। वे सोचते थे कि मुकेश की प्रतिभा को उचित स्थान मिलना चाहिए। वे अपना अतिरिक्त समय देकर भी पढ़ाई में उसकी मदद करते थे। 
मुकेश की चित्रकारी में बहुत दिलचस्पी थी। मास्टर साहब ने देखा कि उसकी कापियों में अक्सर कई आड़ी-तिरछी लकीरें खींची हुई थी जिनका यों तो कोई मतलब नहीं था, लेकिन अगर कला का पारखी कोई व्यक्ति उन लकीरों को देखता तो अवश्य ही प्रभावित हुए बगैर नहीं रहता। वे लकीरें जैसे बहुत कुछ कहती थी। वे उसे और चित्र बनाने के लिए सदैव प्रोत्साहित करते रहते थे।
इसी दौरान पांचवी कक्षा में पढ़ने वाले छात्रों के लिए जवाहर नवोदय विद्यालय में नामांकन हेतु आयोजित होने वाले प्रवेश परीक्षा का फार्म विद्यालय में आया था। मास्टर साहब ने मुकेश का फार्म भरवा दिया कि अगर उसका नामांकन नवोदय विद्यालय मे हो जाता है तो उसकी पढ़ाई की चिन्ता उसके माता-पिता को नहीं करनी पड़ेगी क्योंकि वहां सरकारी खर्चे पर पढाई की सारी व्यवस्था होती थी। उन्होंने उसे उचित मार्गदर्शन  दिया और प्रवेश परीक्षा में मुकेश सफल रहा।
उसका नामांकन जिले के नवोदय विद्यालय में छठी कक्षा में हो गया। उसकी सफलता देखकर उसके माता-पिता बहुत ही खुश थे। वे मास्टर साहब को बार-बार दुआएं देते थे कि उनकी मदद से ही मुकेश का नामांकन इतने अच्छे विद्यालय में हो सका था जहां पढ़ाने के लिए उन्हें कोई अतिरिक्त खर्च नहीं देना पड़ता। 
वहां पढ़ाई के दौरान मुकेश का सामना एक नये ही वातावरण से हुआ। काफी बड़ा विद्यालय परिसर। रहने के लिए हॉस्टल और खाना-पिना, रहना सब मुफ्त। वह मन लगाकर पढ़ाई करने लगा। 
इसी बीच एक राष्ट्रीय स्तर की चित्रकला प्रतियोगिता का आयोजन एक बड़े समाचार-पत्र समूह की तरफ से किया गया था। उसके बारे में मुकेश को भी जानकारी मिली। उसकी चित्रकला में तो शुरू से ही रूचि थी। उसने अपने विद्यालय के शिक्षकों से परामर्श लिया तो कला शिक्षक ने उसका मार्गदर्शन किया। बस उसने एक बच्चे का चित्र बनाया जो आकाश को निहार रहा था, मानों वह उसकी ऊंचाइयों को छू लेना चाहता हो और उसे प्रतियोगिता में भेज दिया।
महीने भर बाद जब अखबार में प्रतियोगिता का परिणाम निकला तो मुकेश को इसकी सूचना अपने विद्यालय के प्रिंसिपल से मिली। उन्होंने खुशी-खुशी बतलाया कि उसके चित्र को न केवल प्रथम पुरस्कार मिला है बल्कि उसकी इस सफलता से देशभर में विद्यालय का भी नाम रौशन हुआ है। 
इस खबर के हफ्ते भर बाद ही गांव से मुकेश के नाम एक पत्र आया जिसे उसके पाठशाला के मास्टर साहब रामजी दास ने लिखा था। उन्होंने लिखा था-``तुम्हारे बारे में अखबार में पढ़ने को मिला। यह जानकर खुशी हुई कि तुम चित्रकला प्रतियोगिता में प्रथम आये हो। कलाकार की साधना एक-न-एक दिन अवश्य रंग लाती है। लेकिन तुम्हारी मंजिल अभी बहुत आगे है, चलते रहो। मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है...।´´
मुकेश ने पत्र को अपने माथे से सटा लिया। उसे ऐसा लग रहा था जैसे  इस पत्र के रूप में उसे सबसे बड़ा पुरस्कार मिल चुका था।

Thursday, December 2, 2010

विश्व एड्स दिवस के बहाने


1 दिसंबर को सारी दुनिया में विश्व एड्स दिवस मनाया जाता है. तमाम राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं इस दिन विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करती है. लोगों को जागरूक करने के लिए इस दिन कुछ नया करने का प्रयास किया जाता है. स्कूली बच्चे भी इस प्रयास में पीछे नहीं रहते. यह एक अच्छी बात है की इस गंभीर और जानलेवा बीमारी के बारे में उम्र की सीमाओं को दरकिनार करते हुए चहुओर आज खुलकर चर्चा की जा रही है.
एक समय था जब एच.आई.वी. पीड़ितों के प्रति लोगों का रुख खासा अपमानजनक रहता था. परिवार के लोग भी किनारा कर लेते थे. शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से एड्स पीड़ित रोगी तिल-तिल कर मरने को मजबूर होते थे. हलाकि अब परिदृश्य पूरी तरह से बदल गया है, ऐसा भी कहना उचित नहीं होगा. हाँ, इतना जरूर कहा जा सकता है कि लोगों कि सोच और मानसिकता  में थोडा फर्क अवश्य आया है. उनकी संवेदना में थोड़ा विस्तार हुआ है. पीड़ितों को जिस सहानुभूति की दरकार थी, वह उन्हें मिलने लगी है. यह जनजागरूकता का प्रयास है कि आम आदमी यह समझने लगा है कि यह बीमारी भूल-चूकवश  किसी को भी हो सकती है. एक गलत सिरिंज का इस्तेमाल किसी को भी इस बीमारी कि चपेट में ले सकता है. ऐसे बहुत सारे केस देखने को भी मिले हैं जब किसी ने इलाज के दौरान अपनी जान बचाने  हेतु अस्पताल में खून चढ़वाया और अनजाने में इस खतरनाक बीमारी के चंगुल में फंस गया. इससे बचने का एकमात्र उपाय जानकारी और जागरूकता की जरूरत ही है. 
इस दिशा में किये जा रहे हर सार्थक प्रयास को मजबूत समर्थन की जरूरत है. यह केवल सरकारी प्रयासों से पूरा नहीं हो सकता, बल्कि आम लोगो को भी इस दिशा में पहल करनी होगी.

Thursday, November 25, 2010

प्रजातंत्र होने के मायने

एक पुरानी कहावत है कि जैसी प्रजा वैसी सरकार! इस बार बिहार विधानसभा के चुनाओं में यहाँ कि जनता ने जिस एकजुटता का परिचय दिया है वह अभूतपूर्व है. यहाँ के चुनाव परिणामों पर सिर्फ बिहार कि ही नहीं बल्कि पूरे देश - दुनिया की निगाहे टिकी हुई थी. और परिणाम भी ऐसा आया कि हारने वाले तो दूर जीतने वाले भी आश्चर्यचकित हैं. कहना न होगा कि यह एक ऐतिहासिक फैसला है. बिहार की जनता का फैसला है.
नीतीश कुमार की नई और मौलिक सोच एवं विकसित बिहार के सपने ने उन्हें सब से अलग किया और जीत का सेहरा पहनाया. सो, बधाई मिलनी लाजिमी है. मिलनी भी चाहिए. एक सामान्य मजदूर से लेकर आम घरेलु महिला तक , छात्र तबका, व्यवसाई वर्ग सभी के खिले हुए चेहरे बता रहे हैं कि उनकी चाहत क्या थी?
243 सीटों में से 206 सीट जीतना अपने आप में एक करिश्मा है. ऐसा यहाँ के इतिहास में संभवतः कभी नहीं हुआ. यह प्रचंड बहुमत सिद्ध  करता है कि विकास के मुद्दे पर सब एकजुट हैं.
लोगों ने अपना काम कर दिया. अब उनकी आशाओं पर खरा उतर कर दिखाना सत्ता पार्टी का काम है. आगामी पांच वर्षों में बिहार विकास कि एक नई इबारत लिखेगा, ऐसा सबको भरोसा है. इसी भरोसे कि बदौलत एन डी ए के खाते में यह जीत आई है.  ऐसी जीत से उत्साहित जरूर होना चाहिए, हां, उन्हें मद से दूर रहना होगा.
लालू यादव और रामविलास पासवान को इस जीत पर शक हो रहा है. उनका कहना है कि वे इसकी जांच करेंगे. शायद वे भूल रहे है कि ऐसी ही जीत व्यक्तिगत तौर पर कभी उन्हें भी मिली थी. तब उन्हें अपनी जीत पर संदेह नहीं हुआ था. सत्ता के मद में अंधे होने पर यह बात भूल जाती है कि जो कुर्सी उन्हें जनता कि सेवा करने के लिए मिली है, वह चिरस्थाई नहीं है. अगर वे अपनी राह से भटकेंगे तो यही जनता उन्हें सत्ता से बेदखल भी कर सकती है. यही प्रजातंत्र के मायने है.

Wednesday, November 10, 2010

शिक्षा दिवस - 10 नवंबर

मौलाना अबुल कलाम आजाद जयन्ति के अवसर पर राजधानी पटना में आयोजित शिक्षा दिवस समारोह में यहां के ख्यातिप्राप्त गणितज्ञ श्री आनन्द को सम्मानित किया जाना हर्ष का विषय है। सुपर थर्टी के संस्थापक संचालक  श्री आनन्द जैसे दुर्लभ व्यक्तित्व विरले ही मिलते हैं, जिन्होंने तन-मन-धन से साधनविहीन छात्रों के लिए अपने आप को समर्पित कर दिया हो। उनकी सुपर थर्टी संस्था आईआईटीयन फैक्ट्री बन चुकी है जो पिछले कुछ वर्षों  से शत-प्रतिशत परिणाम दे रही है।
साधनविहीन मेधावी छात्रों को नि:शुल्क आई.आई.टी. की तैयारी


कहना न होगा कि ऐसे व्यक्तित्व किसी पुरस्कार के मोहताज नहीं होते, अपितु पुरस्कार ऐसे मौकों पर खुद ही पुरस्कृत होता है। श्री आनन्द का यह वक्तव्य कि वे अब पांचवी कक्षा के बाद से ही बच्चों को पढ़ाने का कार्य करना चाहते हैं, निश्चय ही उन गरीब बच्चों के लिए एक शुभ संकेत है जो बचपन में ही मजबूरी में अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ देते हैं। 

अपने छात्रों के साथ ज्ञानदाता आनंद : सफलता के क्षण

बच्चों के भविष्य निर्माण में शिक्षकों का ही महत्वपूर्ण योगदान होता है। समाज में श्री आनन्द जैसे शिक्षक एक मिसाल हैं जिन्होंने आज के अंधे व्यावसायिक युग में नि:स्वार्थ भाव से कार्य कर जाने कितने बूझते चिरागों को न केवल रौशन किया बल्कि उन्हें मुख्यधारा में शामिल कर प्रतिष्ठित भी किया। सचमुच ऐसे व्यक्तित्व वन्दनीय हैं।

मुख्यमन्त्री अक्षर आंचल योजना


शिक्षा दिवस का सम्मान 
नारी के आँचल में अक्षर। 
मां-बेटी दोनों साक्षर।।

पढ़ी-लिखी हर बहना
घर-घर की है गहना ।।

कुछ ऐसे ही नारों के साथ शुरू हुई थी, बिहार में महिला साक्षरता बढ़ाने की एक नई पहल।
राज्य की 15 से 35 आयुवर्ग की 40 लाख असाक्षर महिलाओं को साक्षर बनाने की साल भर चली महत्वाकांक्षी योजना अक्षर आंचल ने आखिरकार महिलाओं में शिक्षा के प्रति तो एक ललक बढ़ा ही दी। भले ही यह योजना कुछ अच्छी-बुरी समालोचनाओं के साथ विगत 8 सितम्बर को अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस के अवसर पर समाप्त हो गई हो- मगर इसका असर उन परिवारों में पीढ़ियों तक जाएगा जिनकी महिलाओं ने इस योजना का लाभ उठाकर पढ़ना-लिखना सीख लिया है।

10 नवंबर को शिक्षा दिवस के अवसर पर मानव संसाधन विकास विभाग द्वारा आयोजित समारोह में इस योजना में समर्पित शिक्षक अक्षरदूतों, साधनसेवियों व कार्यकर्ताओं को सम्मानित किया जाना एक अच्छी पहल है। इससे कर्तव्यपरायण लोगों में एक नये उत्साह का संचार होगा और अन्य लोग भी कुछ अच्छा करने के लिए प्रेरित होंगे।  
पश्चिम चंपारण में जिला स्तर पर चयनित
 बेस्ट के आर पी - ओबैदुर्रहमान  
मधुबनी-पिपरासी  के दियारा क्षेत्र के दुर्गम इलाकों में अक्षर दूत
 एवं नवसाक्षर महिलाओं के साथ के.आर.पी. संजय कुमार